अम्बेडकर को याद किया महावीर स्वामी को कैसे भूल गए ? GuruMaa DhyanMurti Ji



लोगों के कल्याण के लिए,आत्मिक सुख प्राप्ति के तरीके बताने के लिए समय-समय पर तीर्थंकरों ने धरती पर अवतार लिया हैं
महावीर स्वामी को जैन धर्म में भगवान माना जाता है. हर साल चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को महावीर जयंती मनाई जाती है।

इसी के साथ आज बैसाखी भी है जिसे किसान भाई धरती माँ ने उन्हें अन्नदाता बनाया इस रूप में इसे मानतें हैं। 
इसके अलावा जिस गुरु परंपरा ने अखंड भारत में लुटेरों के भेष में घुस चुके अत्याचारी मुगलों से लोहा लेते लेते अनंत दुख सहे, बलिदान दिया परंतु सनातन धर्म नहीं छोड़ा ऐसी गुरुओं की परंपरा को अखंड भारत के निर्माण में सहायक बनाने के लिए अंतिम गुरु श्री गोबिंद सिंह ने इसी दिन खालसा पंथ की स्‍थापना की थी।

क्या है बैसाखी का महत्व? 

आपको बता दे बैसाखी का नाम विशाखा नक्षत्र से लिया गया है। इस समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और गुरुद्वारे में अरदास के लिए जाते हैं।
बैसाखी के मौके पर सूर्य 12 राशि में प्रथम राशि मेष पर जाते हैं इसी वजह से इसे मेष की संक्रांति भी कहते हैं। इस बार 14 अप्रैल को रात 8 बजकर 56 मिनट पर सूर्य मेष राशि में संचरण करेंगे। इस दिन से सौर नववर्ष की शुरुआत होगी। आज ही के दिन से लोग बद्रीनाथ की यात्रा शुरू करते हैं।

महाभरत से बैसाखी के पर्व -

जब पांडव वनवास काट रहे थे उस दौरान जब वो पंजाब के कटराज ताल पहुंचे तो यहां पहुंचते ही सभी को प्यास लगी और बड़े भाई युधिष्ठिर को छोड़कर सभी भाईयों ने उस यक्ष से श्रापित सरोवर का पानी पी लिया और सभी की मृत्यु हो गई। जब काफी देर तक भाई नहीं आए तो युधिष्ठिर उन्हें ढूंढ़ने गए तो उनकी नजर सरोवर पर पड़ी तो वो भी पानी पीने के लिए आगे बढ़ें, लेकिन भाईयों को मृत देखकर वो रुक गए। तभी वहां यक्ष प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि अब अगर आप अपने भाईयों को वापस जीवित देखना चाहते हैं तो आपको मेरे कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। 




युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों का बुद्धिमानी से सही जवाब दिया, उनकी प्रतिभा से प्रभावित यक्ष ने युधिष्ठिर जी के चारों भाईयों को जीवनदान दिया यही दिन था इसलिए तभी से बैसाखी पर्व की उत्पत्ति हुई। आज भी पंजाब के इस कटराज ताल के पास बैसाखी पर बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।

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