जानिए क्या है ध्यान का अनूठा विज्ञान ?

निश्चित ही ध्यान को लेकर आपके जेहन में हजारों सवाल हैं जो समय समय पर आप सभी किसी ना किसी जरिए से मुझसे पूछते रहते हो इन सावालों में सबसे कॉमन सवाल है कि आखिरकार ध्यान है क्या क्योकि ना तो इसकी कोई तस्वीर है न ही आज तक किसी ने इसे देखा इस कारण ज्यादातर लोग इस ज्ञान से वंचित रहे और जिन्हें इस ज्ञान की अनुभुती हुई तो वो असाधारण हो गए इसके बाद उन्होंने इसे गुप्त रखा या कह लीजिए उन्हें कोई ऐसा नहीं मिला जिसे ये ज्ञान सिखाया जाए।।

मुझसे पूछे कि ध्यान क्या है और मैं आपको बता दूं तो भी आप कभी शब्दों के सहारे इसके मायने नहीं समझ पाएंगे क्योंकि शब्दों में इसे परिभाषित करना और समझना उतना ही मुश्किल है जैसे अपने सर के बाल गिनना ध्यान वो गहराई जिसका मापदंड आज तक तैयार नहीं हुआ इसकी शुरुआत तो आप आसानी से कर सकते हैं परंतु इसका अंत आपको नहीं पता खैर फिर भी सरल शब्दों में समझे तो ध्यान व्यवस्थित रूप से जीवन में उस द्वार को खोजने को नाम है जहां से आप में आनंद की किरण उतरनी शुरू होती हैं जहां से आप चीजों से दूर जाते हैं और परमात्मा से जुड़ते हैं। मेरी माने तो ध्यान से ज्यादा कीमती और बहुमूल्य इस संसार में कुछ भी नहीं है।।



प्रार्थना, मेडिटेशन, ईश्वरीय शक्ति या साधना आप ध्यान को कोई भी नाम दें पर आपने इन सभी शब्दों की व्याख्या ना जाने क्या कि है जो आपको सुनने में ही ये इतने कठिन लगते हैं लिहाजा इसे करने की ताकत आप नहीं जुटा पाते जबकी ये बिल्कुल ऐसा है जैसे हमारे घर के किनारे पर ही कोई फूल खिला हो और हमने खिड़की न खोली हो जैसे बाहर सूर्य उदय हो और हमारे द्वार बंद हों जैसे खजाना सामने पड़ा हो और हम आँख बंद किए बैठे हों अपने ही हाथ से अपरिचय के कारण कुछ हम खोए हुए बैठे हैं जो हमारा किसी भी क्षण हो सकता है। ध्यान प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता है क्षमता ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है।

परमात्मा जिस दिन व्यक्ति को इस धरती पर भेजता है ध्यान के साथ ही भेजता है असल में ध्यान हमारा स्वभाव है जिसे हम जन्म के साथ लेकर पैदा होते हैं इसलिए ध्यान से परिचित होना कठिन नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति ध्यान में प्रविष्ट हो सकता है। और सबसे सरल ध्यान की कोई परिभाषा है तो वो है भीतर झांकना ध्यान है उदाहरण के तौर पर जैसे बीज को स्वयं की संभावनाओं का कोई भी पता नहीं होता है ऐसा ही मनुष्य भी है उसे भी पता नहीं है कि वह क्या है? क्या हो सकता है? लेकिन बीज शायद स्वयं के भीतर झाँक भी नहीं सकता पर मनुष्य तो झाँक सकता है यह झाँकना ही ध्यान है। स्वयं के पूर्ण सत्य को अभी और यहीं जानना ही ध्यान है। ध्यान में उतरे गहरे और गहरे गहराई के दर्पण में संभावनाओं का पूर्ण प्रतिफलन उपलब्ध हो जाता है और जो हो सकता है वह होना शुरू हो जाता है। जो संभव है उसकी प्रतीति ही उसे वास्तविक बनाने लगती है। बीज जैसे ही संभावनाओं के स्वप्नों से आंदोलित होता है वैसे ही अंकुरित होने लगता है। शक्ति, समय और संकल्प सभी ध्यान को समर्पित कर दें। क्योंकि ध्यान ही वह द्वारहीन द्वार है जो कि स्वयं को ही स्वयं से परिचित कराता है।

राधे राधे ।।।

Comments

Popular posts from this blog

गुरू मां से जाने झूठ पकड़ने का सबसे आसान तरीका

कौन हूं मैं... ?